दिन 9
जब 10th का परिणाम आया उस समय ननिहाल था। कुछ दिनों बाद घर आ गया। सुरेश चाचा और उनके मित्र मंडली(प्रवीण जी, विशालजी ,लक्ष्मणजी ....) के साथ रिजल्ट्स की समीक्षा की गई।
अब तक सिर्फ एक ही रास्ते पर यात्रा कर रहे थे।अब diversion का समय आ गया।समीक्षा के समय मुझे भी विचार रखने का मौका मिला। मुझे हरेक ऑप्शन के साथ रास्ते में पड़ने वाले मोड के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गयी। मैंने अपने 9th में लिए गए निर्णय को रखा जिससे आर्ट्स और कॉमर्स के रास्ता स्वत: ही बंद हो गए। अब science maths/bio के options में से किसी एक को चुनना था। हालांकि मेरे परिवार से 2 लोग पहले से ही maths में पढ़ चुके थे। सुरेश चाचा और महिपाल भाई। उनके results से मुझे थोड़ा डर भी लगा की जो मैंने चुना है वो सही हैं भी या नही। मुझे मेरी मैथ्स के प्रति रुचि ने bio चुनने को मना कर दिया।
आगे क्या पढ़ने के निर्णय के बाद, कहाँ पढ़ना है ,उसका चुनाव करना था। इस चुनाव का निर्णय कैसे हुआ वो तो नही पता ,लेकिन जिनका भी रहा उनका ज़िंदगी भर शुक्रगुजार रहूँगा।
"उसी दिन शाम को सुरेश चाचा ने पूछा - पासपोर्ट साइज फ़ोटो है?
होंगे! क्यों ? मैने कहा।
11th पढ़ने के लिए जोधपुर में एडमिशन कराना हैं।" चाचा ने कहा ।
मैंने कहा- मैं भी चलता हूँ।
अभी तेरा कोई काम नही है , चाचा ने कहा।
जून के अंतिम सप्ताह में 24 जून 2013 को मेरा एडमिशन श्री महेश स्कूल में हुआ।
मैंने इस स्कूल का नाम पहले नही सुना था। शायद इनका कोई विज्ञापन नही रहा हो। हमने तो अपैक्स का नाम सुना था। जहाँ टॉपर ही टॉपर आते थे ऐसा हम मानते थे। बाजार दर्शन।
"पता नही क्यों, हर जगह जीत की ही कहानी क्यों सुनाई जाती हैं, पराजितों की नहीं।"
खेर...!
3 जुलाई को जोधपुर जाने के लिए बोरिया बिस्तर लेके घर से रवाना हुए। परिवार से हर सलाह दी गयी जो एक गाँव के बच्चे को पहली बार शहर जाने पर दी जाती है, अच्छे से पढ़ना, फालतू बाहर घूमना नही, इत्यादि।...
मैं,सुरेश चाचा, महिपाल भाई, और दादा के छोटे भाई, हम चार जने 3 जुलाई की रात को जोधपुर आए। जोधपुर में एक भुआ रहती है तो उनके घर चले गए। 4 को महिपाल भाई का SLBS कॉलेज में उनका b.tech में कॉउंसलिंग थी तो वे वह चले गए। मैं भुआ के घर ही रहा। शाम को वहाँ से हमारे जहाँ कमरा था, वहाँ आ गया।
5 जुलाई को स्कूल गया । 5th कालांश में गये। रूम नंबर 11। पियोन क्लास तक पहुंचाने आए। उस समय धर्मेंद्र सिंह राठौर (धम-सा) सर् मैथ्स पढ़ा रहे थे।
यहाँ हमारी परिकल्पना से अलग ही कुछ घटनाएँ हो रही थी। क्लास में जूते पहन के बैठना, क्लास में कोई लड़की नही, बैठने के लिए बेंच…!
गाँव मे सभी स्कूल को-एजुकेशन वाले थे और अभी तक फर्श पर ही बैठे थे तो लगा कि यहाँ भी ऐसा होगा। उस दिन शाम को सेकंड हैंड बुक स्टोर से किताबें लाई गई। 6 को प्रार्थना सभा मे गए तो यहाँ भी अलग ही, हारमोनियम,ड्रम,... ! प्रार्थना के बाद प्रिंसिपल सर् द्वारा वेलकम वाला भाषण हुआ। और साथ मे अनाउंस हुआ कि 11th A वाले रूम नम्बर 7 बैठेंगे। तब पता चला कि 6 रूम नंबर वाले की संख्या ज्यादा है तो उन्हें 7 नंबर में और हमे 6 नंबर मे बिठाया गया। पूरे साल वही रूम रहा।
कल वाली क्लास में सबसे पीछे बैठे थे तो बोर्ड पर लिखा पढ़ने के लिए बहुत मसक्कत करनी पड़ी थी तो आज आगे बैठने के लिए जल्दी-जल्दी भाग रहा था।
यहाँ तो इस काम मे सब मेरे जैसे लगे। हर कोई आगे बैठने के लिए लड़ रहा हैं।
सोमवार 8 जुलाई 2013।
अपनी सुविधाजनक जगह पर बैठने के लिए जल्दी स्कूल पहुंचे। जगह भी चुन ली। 2nd row Left side - right corner !
लेकिन उस जगह पर बैठने वाले 2 लोग हो गए। मै और एक और।
. दूसरा पर्सन था-रितेश जोशी .......!
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