दिन 1
दिन 1।
यात्रा!
'जब हम जन्म लेते है तब से ही अपनी यात्रा शुरू हो जाती हैं और अंतिम संस्कार के साथ खत्म हो जाती है'.......!
मै नही जानता मेरी यात्रा कब शुरू हुई लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि इस यात्रा के डगर पर बहुत मुसाफिरों का साथ मिला।
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मेरे जीवन के शुरुआती दिन कैसे थे ....नही जानता! लेकिन जब से जानने की समझ आई तब से ही कुछ यादों की स्मृति में बढ़ोत्तरी होती गयी! सम्पूर्ण स्मृति का बोध तो नही.... कुछेक अंश हैं... जिन्हें revise कर रहा हूँ....
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स्कूल जाने की उम्र तक अभी नही पहुंचा था तब तक अधिकांशतः ननिहाल में ही रहता था! ननिहाल NH-15 से 6km बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना में घोड़े वाले बाबा के क्षेत्र में हैं। ननिहाल में घर पक्के न होकर 2 झोपड़ियों, एक बड़ा सा आँगन, एक बेरी( ~5 मीटर की गहराई का कुआँ...जिसमे खारा पानी केशिकात्व सिद्धान्त से एकत्रित होता हैं, रेगीस्तान में अधिकाँश बेरी पायी जाती हैं ) और एक बड़ा-सा ढालिया था जहाँ मेहमानों की मेहमाननवाजी की जाती।
वैसे तो ननिहाल में सब पसंद थे लेकिन नाना और छोटी मासी से लगाव थोड़ा ज्यादा ही था। नाना का, वो हर शाम किसी न किसी भाई या दोस्त के घर जाना आज भी याद हैं....(नाना के चार भाई और एक बहन थी)। नाना बीड़ी और अफीम के बहुत आदि थे।
मासी, ननिहाल में मेरा ख़्याल इन्हें की जिम्मे था . आजीविका के लिए दोनो मासियाँ कपड़े सिलाई का काम करते थे। मामाओं के सब्जी की ठेला, परचून की दुकान और सबसे बड़े मामा बाड़मेर में हार्डवेयर का काम करते थे।
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उम्र के उस पड़ाव में पहुंच गया, जब जीवन की द्वितीयक विद्यालय जाने के समय,बच्चों को स्कूल से रेगुलराइजेशन करने के लिए किसी बड़े सदस्य,जो स्कूल जाता हो,के साथ भेज दिया जाता। मेरे गाँव में उस समय तीन स्कूल हुआ करते थे, दो सरकारी (प्राथमिक एवं माध्यमिक) और एक निजी ।
हफ्ते भर के लिए मैं अपने काका के साथ सरकारी स्कूल गया लेकिन एक दिन मेरे चमड़े के जूते किसी ने चुरा लिए..उसके बाद स्कूल नही जाने के नाटक करता रहा।
उसके बाद मुझे सरकारी की बजाय निजी स्कूल में रेगुलराइजेशन के लिए पहले दिन स्कूल मेरे पापा छोडने आये थे....और उसके बाद मैं अपने चचेरे भाईयों के साथ जाता रहा।
बहुत ही ख़ूबसूरत लिखा यार
ReplyDeleteअच्छा लगा पढ़के 👏🏼👏🏼🤗