दिन 5।

जिस तरह सीखने से पहले हिंदी में वर्णमाला ,गणित में गिनती, अंग्रेजी में ABCD... से परिचित होते हैं, उसी तरह खेल खेलने से पहले उसके rules या उस खेल की शब्दावली का ज्ञान होना जरूरी है। क्रिकेट में उपयोग किए जाने वाले शब्दो से भी परिचित हुए। वाइड, नोबॉल, आउट, बोल्ड, कैच, रन, over the wicket , point, third man, cover, onside, offside इत्यादि।
             किसी चीज को अगर अच्छे से समझना हो तो उसका theoretical के साथ-साथ practically नॉलेज भी होना चाहिए। theoretically अंपायर बनने के साथ सीख गए। अब क्रिकेट अकेले खेलने वाला खेल तो होता नही है। मैं हमउम्र दोस्तो के साथ खेलता था। दोस्तों के नाम:- हैप्पी, गोपाल,राजू, युवराज , कृपाल, पिंटू, राहुल, उमेश,मिथुन,मुकेश, भावेश पुरोहित,भीमा, कमलेश(चचेरे भाई) और ऐसे बहुत सारे दोस्त जिनके साथ स्कूल की इंटरवल में खेलते थे। दुष्यंत, अमर ,अनुप,अनिल, प्रकाश, अमृत, महेन्द्र, इत्यादि । हमारे लिए रविवार की छुट्टी मतलब क्रिकेट था। शनिवार को रविवार का प्लान बनाया जाता। अगर मैं दादा या पापा के मना करने पर नही जाता तो मुझे बुलाने घर आ जाते थे। फिर सिर्फ 1 घण्टे की अनुमति मिलती थी। मेरे लिए वो एक घंटा कब शाम में तब्दील हो जाता पता ही नही चलता। संध्या होने पर घर से कोई  ढूंढते हुए आता,और घर पहुचंते ही डाँट शुरू हो जाती। उस समय की डांट का एक वाक्य फिक्स ही था "साँझ होते ही ढोर भी घर जाने की सोचते है तुझे घर आने की नही होती"।..... यह सिलसिला 5th तक चला फिर हैप्पी पढ़ने के लिए जालोर चला गया। क्रिकेट खेलना भी कम हो गया। जब कभी छुटियों में हम मिलते, क्रिकेट के कारण रोजाना ही घर पर डाँट पड़ती, फिर अगले दिन वही कहानी शुरू हो जाती ।।।।।
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इसी  समयकाल में मुझे दुकान पर बैठने की प्रैक्टिस करवाई जाती । भारात्मक शब्दावली से परिचय करवाया जाता जैसे:-पाव, आधा, पौना, एक ,सवा, डेढ़,..... इत्यादि। हमारे परिवार की जीविकोपार्जन खेती, दुकान, पशुधन थे।

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