दिन 2

दिन 2।
        'परिवार'... वह शब्द जिसे बच्चों की पहली पाठशाला कहा जाता है। उस समय , हमारे परिवार में दादा-दादी, पापा-मम्मी, चार चाचा, बड़े चाचा की पत्नी, 2 बहनों और मुझे मिलाकर कुल 12 सदस्य थे। दादा के 2 छोटे भाई तथा उनका परिवार और उनकी माँ(पापा की दादी) थी। परिवार सयुक्त न होकर एक कॉलोनी जैसा था और आज भी हैं। हम सबके मकान पक्के ही थे, इन पक्के मकानों से पहले पता नही कितने कच्चे मकानों ने अपना दम तोड़ा होगा। इनके पीछे का संघर्ष पता नही कितना पुराना है, ये सिर्फ तीन भाई और उनकी विधवा माँ ही जानते थे। हमने ये सब एक कहानी के रूप जाना। आज ये कॉलोनी खत्रियों की चक्की के नाम से जानी जाती है।
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    स्कूल, क्रमबद्ध रूप से जाने लगा था। स्कूल से आते ही होमवर्क करने का कुछ जुनून ज्यादा ही था। चूंकि उस समय परिवार में कोई संचार सुविधा नही थी जब कभी भी ननिहाल बात करनी होती तो गाँव में टेलीफोन बूथ पर मम्मी के साथ जाया करता था। 
     किसी मकान को मजबूती देनी हो तो उसकी नींव मजबूत होनी चाहिए। शायद ऐसे ही कुछ नींव मेरी बनी थी,ऐसा मानता हूं। स्कूल के साथ परिवार में मेरी classes लगती थी। शाम का खाना खाने के बाद पापा और चाचा पट्टी पर कभी जोड़, घटाव की प्रैक्टिस करवा लेते थे तो कभी हिंदी में मात्राओ की त्रुटियां होने पर सुलेख दुबारा लिखवाया जाता जब तक एक भी त्रुटी न आए। ये सब शायद उस समय,संयुक्त परिवार में सबसे छोटा होने का प्यार हो या कुछ और ये नही जानता।
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नोकिया 1100। जिन्दगी का पहला मोबाइल देखा जिससे बिना किसी तार के एक जगह से दूसरी जगह बात होती।...
इस मोबाइल का वो सांप वाला खेल, वो स्विच ऑन होते वक़्त हाथो का आना। जैसी  यादें जुड़ी थी उससे। इसके बाद वो लैंडलाइन नंबर जैसे वॉकीटोकी भी देखें, जिसके नंबर आज भी याद है 218016.....!
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डर। जिंदगी में पहली बार 'डर' शब्द क्या होता है उसे सबसे नजदीक से जाना। एक बार खेत में धान की बोरियों को खेत से घर लानी थी तब ट्रैक्टर से गये थे। रमेश चाचा ट्रैक्टर चला रहे थे और मैं और एक मजदूर उस समय ट्रॉली में खड़े होकर जा रहे थे। किसी पत्थर के कारण, ट्रॉली उछली तो मैं ट्रैक्टर और ट्रॉली के बीच में जा गिरा, पता नही कैसे ट्रैक्टर रुकवाया गया। लेकिन ये डर से शायद पहली मुलाक़ात थी।
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स्कूल में दोस्तों का बनना स्वाभाविक हैं। ऐसे ही कुछ दोस्तों की पहली संख्या न होकर सीधे 4 से शुरू होती थी:- हैप्पी,अनिल,मानवेन्द्र और मैं। हैप्पी और मैं एक दूसरे के पूरक थे। 
         "प्रत्येक के जीवन के कुछ पुराने नतीजे, भविष्य के नतीजों को निर्धारित करते हैं।" पुराने नतीजे, अच्छे या बुरे कुछ भी हो सकते हैं लेकिन भविष्य के नतीजे हमेशा अच्छे ही होंगे। इसीलिए कहा भी गया है कि 'जो कुछ भी होता है,अच्छे के लिए होता हैं।' मेरे भी कुछ नतीजे ऐसे ही रहें।

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