Posts

Showing posts from 2020

दिन 10

 अपना कुछ होने वाला है नहीं ऐसा सोच कर वहाँ से निकल गए। अभी शहरी वातावरण में ढला नही था। लगभग हर किसी को अपनी मनपसंद जगह पर बैठने के लिए संघर्ष करना पड़ा। फिर एक दिन धमसा ( क्लास टीचर- धर्मेन्द्र सिंह राठौड़) ने सबको अटेंडेंस नंबर के हिसाब से बिठाया। मेरा नंबर था-11। आगे जाके रोल नंबर मिले 11111 । 11 नंबर के अनुसार लेफ्ट साइड में जगह मिली। पास में धन्नाराम । .. पूरी 11th क्लास में यही बैंच रही। Subject teacher हिंदी -इंद्रा माथुर इंग्लिश-योगिता भाटी फिजिक्स - R.K.त्रिपाठी केमिस्ट्री-श्यामलाल भाटी मैथ्स-धर्मेन्द्र सिंह राठौड़ जब टीचर्स  ने classmates को उनके परसेंटेज पूछे तो मैं 60 की स्ट्रेंथ में कहीं  35-38th position पर था। धीरे-धीरे खुद को शहर की आबो-हवा मे ढाल रहा था।  1 महीने बाद id कार्ड मिल गया  Name -BHAVESH KUMAR MATHS Roll No.- 11111 Class- 11th A School -Shree mahesh Sr Sec school jodhpur  अब तक अगस्त, अक्टूबर, फरवरी में टेस्ट दिए थे। पहली बार तीन tests (1,2,3) का अलग मोड दिखा। weekly टेस्ट के marks एवरेज के अनुसार  तीन टेस्ट्स के मार्क्स मिलने...

दिन 9

जब 10th का परिणाम आया उस समय ननिहाल था। कुछ दिनों बाद घर आ गया। सुरेश चाचा और उनके मित्र मंडली(प्रवीण जी, विशालजी ,लक्ष्मणजी ....) के साथ रिजल्ट्स की समीक्षा की गई। अब तक सिर्फ एक ही रास्ते पर यात्रा कर रहे थे।अब diversion का समय आ गया।समीक्षा के समय मुझे भी विचार रखने का मौका मिला। मुझे हरेक ऑप्शन के साथ रास्ते में पड़ने वाले मोड के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गयी। मैंने अपने  9th में लिए गए निर्णय को रखा जिससे आर्ट्स और कॉमर्स के रास्ता स्वत: ही बंद हो गए। अब science maths/bio के options में से किसी एक को चुनना था। हालांकि मेरे परिवार से 2 लोग पहले से ही maths में पढ़ चुके थे। सुरेश चाचा और महिपाल भाई। उनके results से मुझे थोड़ा डर भी लगा की जो मैंने चुना है वो सही हैं भी या नही। मुझे मेरी मैथ्स के प्रति रुचि ने bio चुनने को मना कर दिया। आगे क्या पढ़ने के निर्णय के बाद, कहाँ पढ़ना है ,उसका चुनाव करना था। इस चुनाव का निर्णय कैसे हुआ वो तो नही पता ,लेकिन जिनका भी रहा उनका ज़िंदगी भर शुक्रगुजार रहूँगा।  "उसी दिन शाम को सुरेश च...

दिन 8।

हरेक मंजिल तक का सफ़र 'एक आगाज' या कहे एक कदम से शुरू होता है चाहे वो अपनी लाइफ का ही पहला कदम क्यों न हो….. बात उस आगाज की है, जो अपने वर्तमान तक का सफ़र पूरा कर चुका है। मई 2012।          नवमी कक्षा उत्तीर्ण कर पहली बार पढ़ने के लिए अपने घर से दूर जाने वाले थे। दूर, बहुत दूर नही सिर्फ 10 किमी। 10th की किताबें जोधपुर से चचेरे भाई से मंगवा ली। 10th कक्षा में 'हैप्पी पब्लिक स्कूल ' रानीवाड़ा में एडमिशन लिया गया। स्कूल से परिचित तो पहले से ही थे।          स्कूल के पहले दिन क्लास में सिर्फ 2 ही विद्यार्थी ही थे :-मैं और गौरव माहेश्वरी। पहली क्लास में अशोक जी राजपुरोहित सर् ने इंग्लिश पढ़ाई। गौरव से पहले कॉमर्स के हरिसिंहजी सर् से मुलाकात हुई। उनके इंट्रोडक्शन करने पर पता नही क्यों धमकियों का एहसाह हो रहा था। फिर मनोज जी सर् से मिलने के बाद अपनी क्लास में आ गये थे। मनोज जी सर फिजिक्स पढ़ाते थे उनसे पहले ही पहचान हो चुकी थी (via सुरेश चाचा)।          ...

दिन 7।

6th,7th क्लास के पल कुछ ज्यादा याद नहीं है। Result कुछ खास नहीं। क्लास में रैंक 2nd रही । इस समयांतराल में शायद मैं सयुंक्त परिवार से एकल परिवार में तब्दील हो गया। इसे आम बोलचाल में बँटवारा कहा जाता हैं। सब कुछ गणित के अंकों में बँट रहा था, जैसे दीवाली पर बच्चों में पटाके बँट रहे हो। जो भाई उस समय अपने -अपने व्यवसाय को संभाल रहा था, उसी के हिस्से वो व्यवसाय आया। किसी का कुछ defend नहीं, सिर्फ आँसू थे। दादा-दादी किसके साथ रहेंगे इसका निर्णय उन्ही के पास सुरक्षित रखा गया। उन्होंने हमारे साथ रहने का निर्णय किया। इस समय 2 चाचा अविवाहित थे, वो भी हमारे साथ रहने लगे। खेत का बँटवारा नहीं हुआ।  हर साल बारी-बारी से फसल उगाते थे । इस बँटवारे का कारण क्या रहा, नही पता.....।  ********* क्लास 8th में आते ही बोर्ड हट गई। नए टीचर आए। पहली बार कुछ पढ़ाई के बारे में पूछने पर पिटे गए थे। टॉपिक ही कुछ ऐसा था जो हर टीचर escape करना चाहते थे...... रिप्रोडक्शन......! इस साल दिसंबर में ज्यादा सर्दी की वजह से अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं cancel हो गई। रिजल्ट अच्छे रहे। ~85%  के साथ 1st।...

दिन 6।

अब तीन की जगह 9 subject पढ़ने के लिए अगली क्लास 6th में आ गये। 6th में आते ही पर्यावरण अध्ययन का सामाजिक और विज्ञान में बंटवारा हो गया और साथ में उनके चार नए दोस्त संस्कृत, कला शिक्षा, S.U.P.W. और स्वास्थ्य शिक्षा को जोड़ा गया। संस्कृत, घर में आए मेहमान की तरह थी। थोड़ी ही समझ आती थी। किसी ने कहा था कि नकल करना गुनाह है, तो किसी ने कहा कि नकल करना गुनाह नही है नकल करते हुए पकड़े जाना गुनाह है। मैं दूसरे वाक्य को मानता था। जिंदगी में पहली बार नकल लेके गया। पूरी की पूरी संस्कृत। परीक्षा से पहले सिर्फ एक दोस्त को बताया था कि नकल लेके आया हूँ।। पता नही क्यों डर लगा कि आज गुनाह हो जाएगा (मतलब पकड़े जाएंगे)।। मन नही माना तो वो सभी पन्ने एक सुरक्षित जगह पर रख दिये ताकि घर जाते वक्त वापिस  ले जा सके। परीक्षा में मेरी चेकिंग हुई , लेकिन पन्ने नही मिले।। गलतियों से भी कुछ सीखा जा सकता है। सुरेश चाचा 10th की पढ़ाई के लिए रानीवाड़ा चले गए। ********** 2003 क्रिकेट वर्ल्डकप, हमारे परिवार में मंझले दादा के घर नया T. V.  लाया गया। पहली बार क्रिकेट मैच को देखा गया उससे पहले सिर्फ रेडियो पर कॉ...

दिन 5।

जिस तरह सीखने से पहले हिंदी में वर्णमाला ,गणित में गिनती, अंग्रेजी में ABCD... से परिचित होते हैं, उसी तरह खेल खेलने से पहले उसके rules या उस खेल की शब्दावली का ज्ञान होना जरूरी है। क्रिकेट में उपयोग किए जाने वाले शब्दो से भी परिचित हुए। वाइड, नोबॉल, आउट, बोल्ड, कैच, रन, over the wicket , point, third man, cover, onside, offside इत्यादि।               किसी चीज को अगर अच्छे से समझना हो तो उसका theoretical के साथ-साथ practically नॉलेज भी होना चाहिए। theoretically अंपायर बनने के साथ सीख गए। अब क्रिकेट अकेले खेलने वाला खेल तो होता नही है। मैं हमउम्र दोस्तो के साथ खेलता था। दोस्तों के नाम:- हैप्पी, गोपाल,राजू, युवराज , कृपाल, पिंटू, राहुल, उमेश,मिथुन,मुकेश, भावेश पुरोहित,भीमा, कमलेश(चचेरे भाई) और ऐसे बहुत सारे दोस्त जिनके साथ स्कूल की इंटरवल में खेलते थे। दुष्यंत, अमर ,अनुप,अनिल, प्रकाश, अमृत, महेन्द्र, इत्यादि । हमारे लिए रविवार की छुट्टी मतलब क्रिकेट था। शनिवार को रविवार का प्लान बनाया जाता। अगर मैं दादा या पापा के मना करने पर...

दिन 4।

जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू  HEAD -TAIL, और दिन -रात होते हैं ,उसी तरह कुछ अच्छा -बुरा भी होता हैं।।  बुरी खबर से अवगत, शायद मैं उस समय 2nd क्लास में होऊंगा: एक दिन स्कूल से घर आते ही मम्मी ने कहा कि नाना बा नहीं रहे....... उस समय इन शब्दों के मतलब को नही जानता था; मम्मी ने पूछा कि क्या तू ननिहाल आना चाहेगा। मैंने क्या जवाब दिया नही पता.. बस इतना पता है कि उस टाइम मैं ननिहाल गया था । शोकाकुल की वे आवाजे आज भी कभी-कभी कानों को दस्तक देती हैं.......।           अंतिम संस्कार होने के बाद वापस घर आने की जल्दी थी.... क्योंकि  मन मे एक डर था कि अगले दिन स्कूल नही जाने के कारण, जब भी स्कूल जाएंगे तो पीटे जाएंगे।  उन विलेन वाले किरदारों के कारण मन मे इस प्रकार के डर ने घर बना लिया था। हम रात को 2 बजे के आस-पास घर आ गये थे । इस समय का याद रहने का कारण वो डर ही था। 'जब कभी सुबह होते ही कहीं जाना हो तो चाँदनी रात भी भोर वाले सूर्य तरह लगती हैं।' ...... अगले दिन स्कूल चले गए और पिटे नहीं गए। ******* **   ...

दिन 3।

           जीवन के पहले इम्तिहान मुकम्मल हुए। इम्तिहान के नतीजे और कक्षा के स्थान में एक युद्ध-सा माहौल हो गया। नतीजों से ज्यादा, कक्षा में स्थान क्या रहा, को तवज्जो दिया गया। पहली कक्षा में प्रथम आये थे और प्रतिशत  65। इसी दरमियां कॉम्पिटिशन(उस समय टक्कर कहते थे ) से भी मुलाकात करली थी। इस कॉम्पिटिशन में मेरा प्रतिद्वंद्वी 'हैप्पी' था। हम केवल परीक्षा में ही प्रतिद्वंद्वी थे । परीक्षा से बाहर हम अच्छे वाले दोस्त हुआ करते थे। अच्छा मतलब, यदि हम में से कोई भी मोनिटर बनता तो दोनों को छोड़कर सब सर् से पिटे जाते।             इसी तरह दूसरी कक्षा मे भी प्रथम आया और प्रतिशत 68। इस बार एक नए शब्द से परिचित हुआ:- विशेष योग्यता। विशेष योग्यता गणित में आई थी। ******* *****        'जिस तरह परिवार एक प्राथमिक विद्यालय है उसी प्रकार स्कूल भी एक परिवार ही होता है।'  स्कूल वाले परिवार में मुखिया श्री मसराराम जी थे। एक और सर् थे जिनसे बहुत प्रभावित हुआ :- श्री मोह...

दिन 2

दिन 2।         'परिवार'... वह शब्द जिसे बच्चों की पहली पाठशाला कहा जाता है। उस समय , हमारे परिवार में दादा-दादी, पापा-मम्मी, चार चाचा, बड़े चाचा की पत्नी, 2 बहनों और मुझे मिलाकर कुल 12 सदस्य थे। दादा के 2 छोटे भाई तथा उनका परिवार और उनकी माँ(पापा की दादी) थी। परिवार सयुक्त न होकर एक कॉलोनी जैसा था और आज भी हैं। हम सबके मकान पक्के ही थे, इन पक्के मकानों से पहले पता नही कितने कच्चे मकानों ने अपना दम तोड़ा होगा। इनके पीछे का संघर्ष पता नही कितना पुराना है, ये सिर्फ तीन भाई और उनकी विधवा माँ ही जानते थे। हमने ये सब एक कहानी के रूप जाना। आज ये कॉलोनी खत्रियों की चक्की के नाम से जानी जाती है। *******     स्कूल, क्रमबद्ध रूप से जाने लगा था। स्कूल से आते ही होमवर्क करने का कुछ जुनून ज्यादा ही था। चूंकि उस समय परिवार में कोई संचार सुविधा नही थी जब कभी भी ननिहाल बात करनी होती तो गाँव में टेलीफोन बूथ पर मम्मी के साथ जाया करता था।       किसी मकान को मजबूती देनी हो तो उसकी नींव मजबूत होनी चाहिए। शायद ...

दिन 1

दिन 1। यात्रा!           'जब हम जन्म लेते है तब से ही अपनी यात्रा शुरू हो जाती हैं और अंतिम संस्कार के साथ खत्म हो जाती है'.......! मै नही जानता मेरी यात्रा कब शुरू हुई लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि इस यात्रा के डगर पर बहुत मुसाफिरों का साथ मिला। *****     मेरे जीवन के शुरुआती दिन कैसे थे ....नही जानता! लेकिन जब से जानने की समझ आई तब से ही कुछ यादों की स्मृति में बढ़ोत्तरी होती गयी!  सम्पूर्ण स्मृति का बोध तो नही.... कुछेक अंश हैं... जिन्हें revise कर रहा हूँ.... *****              स्कूल जाने की उम्र तक अभी नही पहुंचा था तब तक अधिकांशतः ननिहाल में ही रहता था! ननिहाल NH-15 से 6km बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना में  घोड़े वाले बाबा के क्षेत्र में हैं। ननिहाल में घर पक्के न होकर 2 झोपड़ियों, एक बड़ा सा आँगन, एक बेरी( ~5 मीटर की गहराई का कुआँ...जिसमे खारा पानी केशिकात्व सिद्धान्त से एकत्रित होता हैं, रेगीस्तान में अधिकाँश बेरी पायी जाती हैं ) और एक बड़ा-सा ढालिया थ...