दिन 10
अपना कुछ होने वाला है नहीं ऐसा सोच कर वहाँ से निकल गए। अभी शहरी वातावरण में ढला नही था।लगभग हर किसी को अपनी मनपसंद जगह पर बैठने के लिए संघर्ष करना पड़ा। फिर एक दिन धमसा ( क्लास टीचर- धर्मेन्द्र सिंह राठौड़) ने सबको अटेंडेंस नंबर के हिसाब से बिठाया। मेरा नंबर था-11। आगे जाके रोल नंबर मिले 11111 । 11 नंबर के अनुसार लेफ्ट साइड में जगह मिली। पास में धन्नाराम ।.. पूरी 11th क्लास में यही बैंच रही।
Subject teacher
हिंदी -इंद्रा माथुर
इंग्लिश-योगिता भाटी
फिजिक्स - R.K.त्रिपाठी
केमिस्ट्री-श्यामलाल भाटी
मैथ्स-धर्मेन्द्र सिंह राठौड़
जब टीचर्स ने classmates को उनके परसेंटेज पूछे तो मैं 60 की स्ट्रेंथ में कहीं 35-38th position पर था।
धीरे-धीरे खुद को शहर की आबो-हवा मे ढाल रहा था।
1 महीने बाद id कार्ड मिल गया
Name -BHAVESH KUMAR MATHS
Roll No.- 11111
Class- 11th A
School -Shree mahesh Sr Sec school jodhpur
अब तक अगस्त, अक्टूबर, फरवरी में टेस्ट दिए थे। पहली बार तीन tests (1,2,3) का अलग मोड दिखा। weekly टेस्ट के marks एवरेज के अनुसार तीन टेस्ट्स के मार्क्स मिलने वाले थे।
यहाँ से पढ़ाई का तरीका बदल गया। लेकिन इस टेस्ट्स के माहौल में आने के लिये हाफ इयरली एग्जाम तक का समय लग गया। उससे पहले फिजिक्स और केमिस्ट्री में 5+ मार्क्स आये ही नहीं। जब 1st टेस्ट का चक्र पूरा हुआ तो PTM(पैरेंट-टीचर मीटिंग) हुई । PTM का मोड पहली बार देखा। 1st चक्र में एवरेज अच्छे अंक रहे।
अब कुछ नए दोस्त बनने लगे। खासकर अपने पास वाले ही बने। कमलेश सेन अभिमन्यु दवे, प्रदीप सिंह ,धन्ना राम, आकाश जांगिड़।
फिजिक्स की क्लास में R.K.त्रिपाठी सर फटाफट लिखवाते थे, मेरी हिंदी की लिखावट थोड़ी धीमी होने के कारण मैं कहीं बार पीछे रह जाता था। मैंने उसके समाधान के रूप में 'हिंगलिश' में लिखना शुरू किया। जैसे एक को ek ,लंबाई को lambai … आदि। एक बार त्रिपाठी सर् बोलते बोलते कही छूट गए तो आगे बैठने वालो को पूछते क्या लिखा?? … एक बार ऐसी ही स्थिति के कारण सर् ने समझा कि मैं इंग्लिश में लिख रहा और इससे बाकी लोगों को मेरी हिंगलिश का पता लगा।
मेरी इस हिंगलिश का घर जाके हिंदी में लिखने का फायदा मुझे यह मिला कि उसी दिन का पढ़ाया हुआ घर जाके वापस पढ़ लेता था।
अर्धवार्षिक परीक्षा हुई, रिजल्ट्स आए, कॉपियां घर पर दिखाने को मिली। उसके बाद PTM हुई । अर्धवार्षिक के ओवरऑल 68% रहे। सबसे कम फिजिक्स में रहे 40 में से 19। घर आने पर चाचा से डाँट पड़ी। अगर यह रिजल्ट ही रहा तो नेक्स्ट ईयर वापस गाँव में ही ठीक हैं। पता नही क्यों , यह बात मन में चोट कर गयी। अब पढ़ाई का तरीका बदला गया। अन्य विषयों की तुलना में फिजिक्स में मेहनत ज्यादा करनी पड़ी। क्लास में पढ़ाने के अलावा S.P. Publication की गाइड से पढ़ा और उसके नोट्स बनाता।
यहीं से एक नई उम्मीद की किरण मिली। 3rd टेस्ट के लिए weekly टेस्ट का राउंड अच्छा रहा।
मार्च में 12th बोर्ड की एग्जाम के कारण स्कूल का समय बदल गया और साथ में क्लासरूम भी। अब रूम न. 6 की जगह 4 न. में बैठने लगे। यहाँ एक दिन फिजिक्स की क्लास में त्रिपाठी सर् गैसीय नियम का टॉपिक पढ़ा रहे थे तो सर ने 'N' आवोगेद्रो कांस्टेंट जैसे ही बोला, मैं मुस्करा दिया। हालांकि हसने की वजह यह थी कि क्लास में अमित प्रजापत को आवोगेद्रो के उपनाम से बुलाते थे। यही से शुरू होती है लोगों को उपनाम देने की परंपरा।……
तेरा नाम क्या दु आवोगद्रो के दोस्त
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